रूमानी उपन्यास वसन्तसेना यशवन्त कोठारी (पिछले अंक से जारी…) आर्य चारूदत्त प्रातःकाल भ्रमण हेतु चले गये हैं। वसन्त सेना को एक दासी...
रूमानी उपन्यास
वसन्तसेना
यशवन्त कोठारी
आर्य चारूदत्त प्रातःकाल भ्रमण हेतु चले गये हैं। वसन्त सेना को एक दासी उठाती है। वह आर्य चारूदत्त के आवास पर है रात्रि की शिथिलता अभी बाकी है। आर्य उसे पुष्पकरण्डक में आने को कह गये हैं। ऐसा दासी ने वसन्त सेना को सूचित किया। तभी वसन्त सेना चेटी को कहती है कि रत्नावली अन्दर जाकर आयी धूता को दे दें। आर्या से कहना कि चारूदत्त की दासी वसंत सेना का प्रणाम स्वीकार करें।
चेटी-‘लेकिन आर्या धूता मेरे से नाराज हो जाएगी।‘
‘तू मेरी आज्ञा का पालन कर।‘
‘जो आज्ञा-। लेकिन आर्या धूता रत्नावली लौटा देती है। और कहती है - मेरे भूषण तो आर्य पुत्र ही है। आप रत्नावली स्वयं रखें। आर्य पुत्र की दी हुई चीज वापस लेना मुझे शोभा नहीं देता।‘
तभी रोहसेन को लेकर रदनिका प्रवेश करती है। रोहसेन रो रहा है। जिद करता है और कहता है--‘ मैं मिट्टी की गाड़ी से नहीं खेलूंगा। मैं तो सोने की गाड़ी लूंगा।‘
रदनिका से वसन्त सेना पूछती है-‘ यह किसका बच्चा है। यह पता लगने पर कि यह आर्य चारूदत्त का पुत्र है। उसे गोद में लेती है। वह बच्चे को पुचकारती है।
‘पर यह रो क्यों रहा है ?‘
‘यह पड़ोस में सोने की गाड़ी देखकर आया है, वैसी ही गाड़ी लेना चाहता है। रदनिका कहती है। मैंने इसे मिट्टी की गाड़ी बनाकर दी मगर यह नहीं मानता।‘ रदनिका ने समझाया।
‘हाय। यह भी भाग्य के कारण रो रहा है। आज चारूदत्त निर्धन है तो उनका बेटा भी रो रहा है।‘ तभी रोहसेन रदनिका से पूछता है।
‘ये कौन है।‘
‘ये भी तुम्हारी मां है।‘ रदनिका जवाब देती है।‘
‘नही।‘ ये मेरी मां नहीं हो सकती। इनके पास तो इतने सोने के गहने हैं, कीमती कपड़े हैं, ये मेरी मां कैसे हो सकती है।‘ वसन्त सेना स्वर्ण आभूषण उतार देती है, और कहती है - ‘लो मैं तुम्हारी मां हो गयी। इन गहनों से तुम सोने के गाड़ी बनवालो। ‘वसन्त सेना गहने मिट्टी की गाड़ी पर रख देती है। मगर रोहसेन नहीं मानता।
‘नहीं। मैं नहीं लूंगा। रदनिका रोहसेन को लेकर चली जाती है।‘
तभी वर्द्धमानक कहता है कि बैलगाड़ी तैयार है, वसन्त सेना को भेजो।
वसन्त सेना श्रृंगार करती है। तभी वर्द्धमानक गाड़ी का कपड़ा लाने वापस चला जाता है। तभी वहां पर शकार का दास स्थावरक अपनी बैलगाड़ी लाकर भीड़भाड़ के कारण खड़ी कर देता है। और धोखे से वसन्त सेना उसमें बैठ जाती है। स्थावरक रास्ता साफ होने पर गाड़ी चला देता है। उधर वर्द्धमानक की बैलगाड़ी में भगोड़ा आर्यक पहरेदारों से बचता बचाता छुप कर बैठ जाता है। दोनों बैलगाड़िया अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ती है। एक में वसन्त सेना और दूसरे में गोपपुत्र आर्यक। रास्ते में राजा के पहरेदार आर्यक की गाड़ी को रोकते हैं, मगर एक पहरेदार आर्यक का मित्र होता है, अतः आर्यक बच जाता है। इस चक्कर में पहरेदारों में झगड़ें हो जाते हैं। मगर आर्यक की बैलगाड़ी बच निकलने में सफल हो जाती है क्योंकि वह आयर् चारूदत्त की गाड़ी है, जो समाज में आदरणीय है।
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आर्य चारूदत्त अपने विदूषक मित्र के साथ पुष्पकरण्डक बाग में टहल रहे हैं। वे एक शिलाखण्ड पर बैठ जाते हैं। चारूदत्त का मन उद्विग्न है वे वसन्त सेना का इंतजार कर रहे हैं मैत्रेय बाग की शोभा का वर्णन करता है, प्रकृति चित्रण करता है, मगर चारूदत्त का मन नहीं लगता है।
‘वर्द्धमानक अभी तक नहीं आया मित्र मैत्रेय।‘
‘हां पता नहीं कैसे देर हो गई।‘
तभी वर्द्धमानक गाड़ी लेकर पहुँचता है। वसन्त सेना के आगमन की खुशी में आर्य चारूदत्त उतावले हो रहे हैं। वे मित्र को गाड़ी घुमाने और वसन्त सेना को उतारने का आदेश देते हैं। तभी गाड़ी में देखकर मैत्रेय कहता है -
‘मित्र ये तो वसन्त सेना नहीं है।‘
चारूदत्त -‘क्या कहते हो मित्र। यह हमारी बैलगाड़ी है, हमारा गाड़ीवान है, हमने इसे वसन्त सेना को लाने भेजा था। इसमें कोई पुरूष कैसे हो सकता है।‘
गाड़ी के पास चारूदत्त गाड़ी में देखता है। उसी समय आर्यक की नजर उस पर पड़ती है। आर्यक चारूदत्त को देखकर संतोष की सांस लेता है उसे लगता है अब वह सुरक्षित है। उसके ऊपर राजा का जो खतरा मण्डरा रहा था, वह फिलहाल टल गया। चारूदत्त भी आर्यक को देखकर वििस्मत रह जाता हैं।
‘अरे यह कौन हैं ? इनकी विशाल भुजाएं, उन्नत ललाट, विशाल वक्षस्थल, सिंह के समान ऊंचे कंधे, बड़ी-बड़ी लाल आँखें और पांवों में बेड़ियां, आर्य आप कौन हैं ?‘
आर्यक अपना परिचय देता है और राजा पालक बंदी बनाये जाने के बाद काराग्रह से शविर्लक की मदद से भागने की घटना बताता है। चारूदत्त आर्यक का परिचय पाकर परम प्रसन्न होता है - कहता है।
‘आज मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपके दर्शन हुए है। मैं अपने प्राण देकर भी आपकी रक्षा अवश्य करूँगा। आप विश्वास रखें। चारूदत्त अपने अनुचर को अाज्ञा देकर आर्यक की बेड़ी कटवा देता है। बेड़ी कट जाने पर आर्यक कहता है।‘
‘आर्य मैं कृतज्ञ हूं। आपने मुझे एक बेड़ी से काट कर प्रेम की बेड़ी से जकड़ लिया है।‘ अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिये।‘
अभी आपके पांव में घाव है, आप इसी मेरी गाड़ी द्वारा जाये। इससे कोई आप पर शक नहीं करेंगा। और आप सुरक्षित व कुशलता से पहुँच जायेंगे। ईश्वर आपकी रक्षा करे।‘ चारूदत्त कहता है।
आर्यक चला जाता है।
आर्य चारूदत्त मैत्रेय से कहते हैं -
‘हमने राजा पालक के विरूद्ध कार्य किया है, हमें इस स्थान पर अधिक नहीं रूकना चाहिए। वसन्त सेना अभी तक नहीं आई है। मैं विरह से व्याकुल हूं। मेरा हृदय घबरा रहा है। पता नहीं क्या अनिष्ट होने वाला है। हमें अब यहां से चल देना चाहिए।‘ वे दोनों वहां से चल देते हैं।
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एक बौद्ध भिक्षु अपनी धीर गंभीर चाल से अपने हाथ में गीला चौला लेकर चल रहा हैं। वे लोगों को धर्म के अनुसार चलने के लिए उपदेश देते हैं। धर्म ही सब कुछ है। धर्म के अलावा सब कुछ मिट जायेगा। धर्म के अनुसार आचरण करो। इन्द्रियों को वश में करो। अविद्या का नाश करो। सिर दाढ़ी मुण्डाने से कुछ नहीं होता, मन मुंडवाना चाहिए। मेरा चौला गंदा हो गया है। इसे धोना जरूरी है। ‘बौद्ध भिक्षु राजाके साले शकार के बाग में प्रवेश करते हैं।‘ वे कहते हैं -
‘बुद्धम शरणम् गच्छामि।
संघम् शरणम् गच्छामि॥
धम्म शरणम् गच्छामि॥।‘
तभी राजा का साला शकार हाथ में नंगी तलवार लेकर विट के साथ बाग में आता है। राजा का शाला भिक्षु को देखकर क्रोधित स्वर में कहता है।
‘ठहर भिक्खू ठहर। मैं अभी तेरा सिर काट कर फेंकता हूं।‘
विट शकार को ऐसा करने से रोकता है। वह शकार को दूसरी तरफ ले जाना चाहता है। भिक्षु की तरफ देख कर शकार फिर उसे मारने दौड़ता है। भिक्षु उसके कल्याण की कामना करता है। कहता है --
‘आप पुण्यवान हैं। धनवान हैं। आप का कल्याण हो।‘
‘ये मुझे गाली क्यों दे रहा है।‘ शकार ने पूछा
‘यह गाली नहीं प्रशंसा कर रहा है।‘ विट ने समझाया।
शकार भिक्षु से पूछता है।
‘तुम इधर क्यों आये हो।‘
‘मैं अपना चौला धोने आया हूं।‘
‘अच्छा तो तुम मेरे शबसे शुन्दर बाग में अपना गंदा चौला धोने के लिए आया है। तुम इस बाग के शाफ पानी को गंदा कर रहे हो। मैं तुम्हें एक बेंत की शजा शुनाता हूं।‘
विट उसे फिर बचाने का प्रयास करता है। कहता है --
‘इसके मुण्डे सिर तथा गेरुए वस्त्र पहनने की स्थिति से ऐसा लगता है कि यह नया-नया भिक्षु बना है।‘
‘ठीक है तो यह जन्म से भिक्षु क्यों नहीं है।‘ शकार ने पूछा।
लेकिन विट उसे समझा बुझाकर मना लेता है। भिक्षु एक तरफ चला जाता है।
विट और शकार बाग में विचरण करते हैं। एक शिलाखण्ड पर बैठ कर शकार वसन्त सेना की याद में खो जाता है। शकार विट से पूछता है-
‘श्थावरक को गये इतना समय व्यतीत हो गया है। वो अभी तक बैलगाड़ी लेकर वापस नहीं आया है। मैं बड़ी देर से भूखा हूं। अब मैं चल भी नहीं सकता।‘
‘आप ठीक कह रहे हैं। प्यास से व्याकुल जंगली जानवर पानी पीकर आराम कर रहे हैं। तपती दोपहर है, बैलगाड़ी भी कहीं ठहर गयी होगी।‘ विट के इस प्रत्युत्तर से शकार का मन शांत होता है। वह गाने लगता है। --
‘कैसा लगा मेरा गाना।‘
‘आप तो गन्धर्व हैं। आपका गाना तो सुन्दर है।‘ वह फिर गाता है।
‘श्थावरक अभी भी नहीं आया।‘ शकार फिर उद्धिग्नता से पूछता है। तभी दूर से बैलगाड़ी के आने की आवाजें आती हैं। श्थावरक बैलगाड़ी में वसन्त सेना को लेकर आता हैं। वह बैलगाड़ी को बड़ी तेजी से हांक कर लाता है और आवाज लगाता है।
आवाज सुनकर वसन्त सेना सोचती है वह आवाज तो वर्द्धमानक की नहीं है। क्या बात है क्या आर्य चारूदत्त ने किसी दूसरे गाड़ीवान को भेजा है। मेरा मन अशांत क्यों हैं ? क्या कोई अघट घटने वाला है। शकार गाड़ी की आवाज सुनकर गाड़ी के निकट आता है। गाड़ी को देख कर शकार खुश होता है। गाड़ी को अन्दर लाने की आज्ञा देता है। शकार िवट को गाड़ी पर चढ़ने की आज्ञा देता है। फिर उसे रोक कर स्वयं गाड़ी में देखता है। डर कर पीछे हट जाता है। गाड़ी में स्त्री है या राक्षसी है। ‘तभी वसन्त सेना भी गाड़ी में से शकार को देखती है। सोचती है - यह राजा का साला शकार कहां से टपक पड़ा। मैं तो अपने पि्रयतम आर्य चारूदत्त की सेवा में आई थी। हाय मैं बड़ी अभागन हूं। अब मैं क्या करूं ?‘ वह घबरा जाती है। विट वसन्त सेना को देखता है। और कहता है - ‘तुम राजा के साले का पीछा क्यों कर रही हो। यह अनुचित है। धन के लोभ से शायद तुम अपनी मां के कहने से राजा के साले के पीछे पड़ी हो।‘
वसन्त सेना इस बात से इंकार करती है। उसकी समझ में आ गया कि गाड़ी बदल गई है। वह कहती हैं - परन्तु मेरा कोई दोष नहीं है। गाड़ी बदल गई है। गाड़ी बदल जाने के कारण मैं यहां पहुंची हूं। आप मेरी रक्षा करना।‘ वह विट से रक्षा की याचना करती है। विट उसे आश्वासन देता हैं। वह शकार के पास जाकर कहता है - सच में गाड़ी में कोई राक्षसी ही है।‘
शकार उसकी बात नहीं मानता। विट उसे उज्जयिनी चलने की सलाह देता है, शकार उसे भी नकार देता है। तभी वह गाड़ी पर बैठ कर जाने का विचार करता है। वह वसन्त सेना को देख लेता है। प्रसन्न हो जाता है। वह वसन्त सेना के पांव में गिर कर कहता है।
‘देवी मैं सुन्दरता का पुजारी हूं। मेरी प्रार्थना सुनो। मैं भिखारी हूं। मेरी झोली भर दो। समर्पण दो।‘ वसन्त सेना क्रोध से उसे झिड़क देती है। वह शकार को पांव से ठोकर लगाती है। शकार क्रोधित हो जाता है। क्रोध में कहता है --
‘जिश मस्तक पर अम्बिका ने प्यार से चुम्बन लिया था। जो शिर देवताओं के शामने नहीं झुका, तुमने उशी शिर को ठोकर मार दी। श्थावरक तुम इसे कहां से लाये हों ?‘
श्थावरक उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराता है, कि राजपथ्ा पर बहुत सी बैलगाड़ियां थी, और चारूदत्त के बाग के द्वार पर गाड़ी खड़ी की थी वहीं पर शायद गलती से वसन्त सेना गाड़ी में बैठ गई।
‘अच्छा तो ये गाड़ी बदलने शे यहां आई है। मुझशे मिलने नहीं। उतारो। इशे गाड़ी से उतारो। तू इस गरीब चारूदत्त से मिलने के लिए मेरे बैलों पर भार डाल रही हो। उतरो जल्दी करो।‘ तभी शकार क्रोध में वसन्त सेना को उतरने के लिए कहता है - उतर नीचे उतर मैं तेरे केशों को पकड़ कर खीचूंगा। तुझे मारूंगा।‘
तभी विट वसन्त सेना को नीचे उतारता है। वसंत सेना एक तरफ खड़ी होकर कांपने लगती है।
शकार का क्रोध और भड़क जाता है। वह अपमान का बदला लेना चाहता है। वह विट को वसन्त सेना को मारने का आदेश देता है, मगर वसन्त सेना को विट नहीं मारता। फिर वह श्थावरक को कहता है, वह भी सोने के लालच के बावजूद वसन्त सेना को नहीं मारता। तब क्रोध में शकार स्वयं वसन्त सेना को मारने के लिए आगे बढ़ता है। विट उसे रोकता है। विट वसन्त सेना की रक्षा हेतु पास में छुप जाता है। शकार वसन्त सेना को प्यार करने के लिए तैयार होता है लेकिन वसन्त सेना उसे प्रताड़ित करते हुए कहती है --
‘एक बार आम खाने के बाद में आक को मंुह नहीं लगाती।‘ शकार को पुनः क्रोध आता है। वह स्वयं को अपमानित महसूस करता है।
शकार क्रोध में उसे मारने दौड़ता है। वसन्त सेना आर्तनाद करती है।‘ मां ? आर्य चारूदत्त को पुकारती है। मगर शकार वसन्त सेना का गला दबा देता है। वसन्त सेना आर्य चारूदत्त को पुकारती-पुकारती बेहोश हो जाती है। शकार उसे मरा समझ कर दूर बैठ जाता है।
विट वापस जाता है तो बाग के रास्ते में वसन्त सेना को पड़ा देखता है। वह चिल्लाता है।
‘नीच पापी तूने वसन्त सेना को मार डाला। तूने अत्याचार क्यों किया ? अब भगवान ही भला करेंगे।‘
विट शकार को देखकर वसन्त सेना के बारे में पूछता है, उसे अपनी धरोहर बताता है। मगर शकार बताता है कि वह तो चली गयी शायद पूर्व की ओर या दक्षिण की ओर। लेकिन बाद में विट को बता देता है कि उसने वसन्त सेना को मार कर बदला ले लिया। विट यह सुनकर मूर्छित हो जाता है।
श्थावरक भी अपने आपको इस हत्या का अपराधी समझता है। शकार वसन्त सेना की हत्या का आरोप विट पर लगा कर उसे फंसाना चाहता है। शकार विट को अपराध स्वीकार करने की सलाह देता है। विट तलवार खींच कर लड़ने का प्रयास करता है। वह श्थावरक को अपने गहने देकर अपनी तरफ मिलाने का प्रयास करता है, मगर श्थावरक नहीं मानता वह श्थावरक को महल भेज देता है। बाद में बुर्जी में कैद कर देता है। अब शकार वसन्त सेना के शरीर को सूखे पत्तों से ढक लेता है। और न्यायाधीश के पास जाकर फरियाद करने की योजना बनाता है, ताकि वसन्त सेना की हत्या का अिभयोग चारूदत्त पर लगा सके। शकार बाग से निकल भागता है। तभी एक बौद्ध भिक्षु उस रास्ते से निकलता है। वह वसन्त सेना को सूखे पत्तों से निकालता है। पानी पिलाता है। वसन्त सेना को होश आता है। भिक्षु उसे पहचान लेता है, कहता है-
‘आपने मेरी जान जुआरियों से बचाई थी।‘ भिक्षु उसे विहार में ले जाकर आराम से ठहरा देता है। भिक्षु की बहन वसन्त सेना की सेवा करती है। वसन्त सेना शीघ्र ही स्वस्थ हो जाती है। वसन्त सेना मन ही मन चारूदत्त को याद करती हैं।
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किसी भी राज्य में कानून और व्यवस्था का सुचारू रूप से चलना बहुत आवश्यक है। राज्य में सुख, समृद्धि तथा शांति कानून और व्यवस्था पर निर्भर हैं। अपराधी को दंड और निरपराधी को माफी बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। न्याय व्यवस्था इसीलिए होती है कि नियम व कानून सब पर बराबरी से लागू हो। कानून से ऊपर कोई नहीं है। न्याय तथा न्याय व्यवस्था का सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है। राज सत्त भी न्याय से ऊपर नहीं है, लेकिन यदि किसी कारणवश अपराधी खुले घूमें तो सम्पूर्ण व्यवस्था चरमरा जाती है, और इस टूटती जर्जर होती व्यवस्था में से एक नई व्यवस्था जन्म लेती है, जो ज्यादा सुदृढ़, ज्यादा मजबूत और ज्यादा स्थिर होती है। स्थिरता से ही समाज में समरसता एवं समृद्धि आती है। न्याय इस सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखता है।
उज्जयिनी नगर में भी न्याय के लिए न्यायालय थे।
न्यायालय के अधिकारियों की आज्ञा पाकर शोधनक न्यायमंडल के आसनों को जमा रहा है। आसनों की तथा कक्षों में सब तरफ की सफाई कर रहा है। इसी समय राजा का साला शकार भड़कीलें कपड़ों में प्रवेश करता है। शोधनक उससे बचना चाहता है। शकार न्यायालय में वसन्त सेना की हत्या का पाप गरीब चारूदत्त के ऊपर लगाने को उपस्थित हुआ है। वह जानता है कि निर्धन पर सब कुछ थोपा जा सकता है। वह न्यायालय में आता है। इसी समय न्यायाधीश न्यायालय में प्रवेश करते हैं। उनके साथ सेठ, कायस्थ आदि भी चल रहे हैं। शोधनक न्यायाधीश, सेठ व कायस्थ को न्यायालय के मुख्य कक्ष में ले जाता है। न्यायाधीश की आज्ञा पाकर शोधक बाहर आकर लोगों से अपील करता है कि जो लोग न्याय मांगने आये हैं वे अपना पक्ष प्रस्तुत करने हेतु माननीय न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत हो। तभी शकार घंमड से बोलता है --
‘मैं राजा का शाला शंस्थानक न्याय की मांग करता हूं।‘
‘शोधनक अन्दर जाकर सूचना देता है कि राजा का साला संस्थानक न्याय मांगने हेतु उपस्थित हुआ है।‘ शोधनक की बात सुन कर न्यायाधीश कहते हैं।
‘आज अवश्य कुछ अनर्थ होगा। तुम राजा के साले से जाकर कह दो कि आज उसके अभियोग पर विचार नहीं हो सकेगा।‘
यह सूचना जब राजा के साले शकार यानि संस्थानक को मिलती है तो वह क्रोध में न्यायाधीश को आज ही अभियोग पर विचार करने की अपील करता है। शोधनक पुनः न्यायाधीश से निवेदन करता है। न्यायाधीश शकार की बात सुनने के लिए उसे कक्ष में बुलाते हैं।
न्यायाधीश -‘ आप न्याय चाहते हैं।‘
शकार -‘हां।‘
न्यायाधीश -‘तो बोलिये क्या बात है ?‘
शकार अपने परिवार की प्रशंसा करता है। मगर न्यायाधीश उसे मूल बात कहने को प्रेरित करते हैं।
शकार -‘तो सुनिये। मेरी बहन के प्रिय राजापालक ने मुझे पुष्पकरण्डक बाग उपहार में दिया है। आज जब मैं वहां पर गया तो मैनें वहां पर एक स्त्री के शव को देखा।‘
न्यायाधीश -‘कौन सी स्त्री।‘
शकार-‘उसको कौन नहीं जानता। वह तो उज्जयिनी नगरी की शोभा वसन्त शेना थी। किसी अपराधी ने उसको धन के लालच में मार डाला।
मैनें नहीं․․․․․․․․․․․․․․․․․․․।‘
न्यायाधीश -‘सेठ। कायस्थ। तुम इन बयानों को लिख लो। यह नगरी के पहरेदारों की असावधानी का फल है।‘
शकार -‘वसन्त शेना के शरीर पर कोई गहना नहीं था।‘
न्यायाधीश -‘इस मामले में निर्णय होना मुश्किल है। शोधनक वसन्त सेना की मां को बुलाओ।‘
वसन्त सेना की मां को न्यायालय में प्रवेश मिलता है। वह वृद्धा, मोटी, चपला, गणिका की मां की तरफ लगती है।
‘मेरी पुत्री तो अपने मित्र के यहां पर गई हुई है। आपने मुझे यहां क्यों बुलाया हैं ? ईश्वर आपका कल्याण करें।‘
न्यायाधीश वसन्त सेना की मां से प्रश्न करते हैं।‘
‘आपकी पुत्री किस मित्र के यहां गई थी ? उस मित्र का क्या नाम है ?‘
मां -‘मेरी पुत्री कहां गई थी। यह बताना तो बड़ी सजा की बात है, मगर न्याय की खातिर सब बताना आवश्यक भी है, मेरी पुत्री सागरदत्त के पुत्र आर्य चारूदत्त के यहां पर गई थी।‘
शकार -‘इन शब्दों का भी अंकन कीजिये। इसी चारूदत्त से मेरी लड़ाई है।‘
न्यायाधीश -‘अब न्याय से पूर्व आर्य चारूदत्त को बुलाना भी आवश्यक है।‘
न्यायाधीश शोधनक को चारूदत्त को न्यायालय में प्रस्तुत करने का आदेश देता है। शोधनक आर्य चारूदत्त को लेकर न्यायालय में प्रवेश करता है। आर्य चारूदत्त चिंतित मुद्रा में न्यायालय में आते हैं। सोचते हैं - गरीब आदमी की बड़ी मुसीबत है। क्या आर्यक और मेरी वार्ता का समाचार शासन को मिल गया है। चारों तरफ अपशुकन हो रहें हैं। मुझे अपराधी की तरह क्यों बुलाया जा रहा है। क्या कोई भयानक दुर्घटना होने वाली है। ईश्वर मेरी रक्षा करे। यह सोचते हुए वे न्यायालय में उपस्थित होते हैं।
न्यायाधीश चारूदत्त के स्वरूप को देखकर प्रशंसात्मक मुद्रा में सोचते हैं, यह युवक दोषी नहीं हो सकता। वे चारूदत्त को बैठने के लिए आसन लगाने का आदेश देते हैं। आर्य चारूदत्त को देखकर शकार क्रोधित हो जाता है। कहता है --
‘तुम हत्यारे हो, तुमने स्त्री की हत्या की है। तुम्हें आशन नहीं दंड मिलना चाहिए।‘
तभी न्यायाधीश शकार को चुपकर चारूदत्त से पूछते हैं --
‘क्या आप इस वृद्धा की लड़की को जानते हैं ? उससे आपका कोई संबंध है ?‘ वसन्त सेना की मां को देखकर चारूदत्त शर्मा जाते हैं। न्यायाधीश स्पष्ट रूप से कहने में निर्देश देते हैं तो चारूदत्त बोलते हैं।
‘जी हां, वसन्त सेना, मेरी मित्र है।‘
न्यायाधीश -‘इस समय वसन्त सेना कहां हैं ?‘
-‘अपने घर होंगी।‘ चारूदत्त ने सीधा उत्तर दिया। सेठ कायस्थ -‘कब गई ? किसके साथ गई ? कैसे गई ? सब सच-सच बताओ।‘
चारूदत्त -‘अब ये सब मैं क्या बताऊं ?‘
शकार -‘तुमने उशे मेरे बाग में ले जाकर मार डाला।‘
चारूदत्त यह सुनकर क्रोधित हो उठता है।
‘अरे बकवादी क्यों झूठ बोल रहा है। तेरा मुँह झूठ बोलने से काला पड़ गया है।‘
न्यायाधीश विचार करते हैं आर्य चारूदत्त ऐसा अपराध कैसे कर सकते हैं। यह राजा का साला अवश्य झूठ बोल रहा है, मगर सही स्थिति का पता कैसे लगे ? अपनी बेटी की हत्या के समाचार से वसन्त सेना की मां रोने लग जाती है।
तभी न्यायाधीश न्यायालय में नगर रक्षक आते हैं, न्यायाधीश उन्हें पुष्परण्डक बाग में जाकर मरी पड़ी लाश की जानकारी लेने का आदेश देते हैं।
न्यायाधीश के आदेश पर नगर रक्षक बाग में चले जाते हैं। शकार न्यायाधीश को कहता है --
‘आप कब तक इश नीच चारूदत्त को आशन पर बिठायेंगे। इसे तो शजा मिलनी चाहिए। राजा।‘
तभी चारूदत्त का विदूषक मित्र मैत्रेय भी न्यायालय में आ जाता है।
मैत्रेय चारूदत्त से पूछते हैं-
‘क्या बात है मित्र कुशल तो हैं ?‘
‘मेरे ऊपर अभियोग है कि मैंने वसन्त सेना को․․․․․․․․․․․․․․। अब मेरा क्या होगा ?‘
‘क्या ?‘
‘हां अभियोग चल रहा है।‘ मैं गरीब निर्धन ब्राह्माण हूं, इसलिए मेरी बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है। हे मित्र, मैत्रेय ये क्या हो गया ? तभी मैत्रेय के पास स्वर्ण के आभूषण देखकर शकार कहता है -
- माननीय न्यायाधीश ये गहने वशन्त शेना के ही है। इन्हीं गहनों के लिए उसकी हत्या कर दी गई है।‘
चारूदत्त और भी अभियोग में फंस जाता है। सेठ-कायस्थ गहनों की परख वसन्त सेना की मां से कराते हैं।
मां -‘ये गहने वैसे ही है, मगर वे नहीं है ?‘
कायस्थ -‘एक बार पुनः देखिये।‘
मां -‘देख लिये वे गहने नहीं है।‘
न्यायाधीश चारूदत्त के अभियोग पर विचार करते हैं।
‘मैं आपसे निवेदन करता हूं कि आप सच बोले। नहीं तो दंड के भागी होंगे।‘
चारूदत्त -‘अब मैं क्या कहूं। मैं निर्दोष हूं।‘
शकार -‘ कह दें उसे मैंने मार दिया है।‘
चारूदत्त -‘आपने तो कह ही दिया है।‘
शकार -‘देखा आप लोगों ने इशने ही वशन्त शेना को मार डाला है अब इसे दण्ड दीजिये।‘
न्यायाधीश -‘शकार का कथन उचित है। चारूदत्त को बंदी बना लो।‘
वसन्त सेना की मां रोती है। कलपती है। शोधनक उसे बाहर छोड़ आता है। न्यायाधीश शोधनक को आदेश देते हैं कि महाराज पालक को इस अभियोग की सूचना दी जाये। ब्राह्माण को मारा नहीं जा सकता मगर देश निकाला दिया जा सकता है। यह निर्णय अब महाराज को ही करना है।
महाराज का आदेश शाेधनक सुनाता है जिन गहनों के कारण वसन्त सेना की हत्या हुई है, उन्हीं गहनों को पहनाकर चारूदत्त को दक्षिण मरघट पर फांसी पर लटका दिया जावे। इस हृदय विदारक समाचार को सुनकर चारूदत्त अपने मित्र मैत्रेय से कहता है --
‘मेरे मित्र जाओ मेरी प्राणप्रिया धूता को इस दुख्ाद समाचार से अवगत कराओ और कहना मेरे बाद मेरे बच्चे को पालन करे।‘
‘मित्र जब जड़ ही सूख जायेगी तो पेड़ कैसे चलेगा।‘ मैत्रेय बोला।
‘ऐसा न कहो मित्र। मेरे ऊपर तुम्हारा जो प्रेम है उसे रोहसेन पर समर्पित कर दो।‘ चारूदत्त रुधें गले से कहता है।
‘मित्र मैं तुमसे बिछड़ कर जी कर क्या करुंगा ?‘
‘एक बार मुझे रोहसेन और धूता से मिला देना।‘चारूदत्त फिर कहता है।
न्यायाधीश महोदय चारूदत्त को ले जाने का आदेश देते हैं। वे फांसी देने वाले कर्मचारियों को तैयार रखने के भी आदेश देते हैं। शोधनक चारूदत्त को काराग्रह में ले जाता है। मैत्रेय घर की आरे जाकर धूता को सूचित करता है।
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आर्य चारूदत्त को फांसी पर चढ़ाने की तैयारी हो रही है। उन्हें राज कर्मचारी फांसी स्थल तक ले जा रहे हैं। फांसी देने वाली कर्मचारी अनावश्यक भीड़ को हटा रहे हैं। हर चौराहे पर रोक कर प्रजा को उनके अपराध की जानकारी दी जा रही है। चारूदत्त मन में विचार करते हुए चल रहे हैं। भाग्य की लीला का क्या कहना। आज में किस हालत में पहुँच गया। जीवन तो उतार-चढ़ाव का दूसरा नाम हैं। शरीर पर चंदन लगा दिया गया है। तिल, चावल, कुकुम लग गया है। अब अन्त समीप है। दुःख है कि निर्दोष होने के बावजूद सजा मिल रही है।
कर्मचारी लोगों को दूर हटा रहे हैं। प्रथम चौराहे पर कर्मचारी ढिंढोरा पीट कर लोगों को चारूदत्त के अपराध और सजा की घोषणा करते है कर्मचारी कहता हैं --
‘सुनो, प्रजा जनो सुनो। आर्य चारूदत्त पिता सागरदत्त ने धन के लोभ में गणिका वसन्त सेना को पुष्पकंडरक बाग में ले जाकर मार डाला है। गहनों सहित उन्हें पकड़ लिया गया है और राजापालक ने उन्हें सूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी है। यदि कोई दूसरा प्रजाजन भी ऐसा काम करेगा तो दण्ड का भागी होगा। सुनो․․․․․․․․। ‘कर्मचारी चारूदत्त को ले चलते हैं। प्रजा में से कोई कहता है --
‘सबका भला करने और भला सोचने वाले आर्य चारूदत्त आज इस दशा को प्राप्त हो गये हैं। वे इस दुनिया से जा रहे हैं। संसार में निर्धन की कोई नहीं सुनता। धनवान, शक्तिशाली की सभी सुनते हैं। ‘हे भाग्य तू भी क्या खेल दिखाता है।‘ राजमार्ग से होते हुए कर्मचारी चारूदत्त को वन स्थल की ओर ले जाते हैं। चारूदत्त वसन्त सेना को याद करते हैं। आर्य चारूदत्त वध-स्थल के पास है। कर्मचारी उन्हें सूली पर चढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। आर्य चारूदत्त अंतिम इच्छा के रूप में अपने पुत्र रोहसेन को देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। कर्मचारी रोहसेन को लाते हैं। रोहसेन ‘पिताजी - पिताजी‘ कह कर दौड़ता हुआ है और चारूदत्त से लिपट जाता है। चारूदत्त आंखों में आंसू भरकर पुत्र को देखता है छाती से लगा लेता है - कहता है।
‘हाय मेरे पुत्र - हाय मेरे मित्र मैत्रेय । यह सब देखना भी बदा था। मैं अपने पुत्र को क्या दूं। मेरी जनेऊ तू रख ले पुत्र। जनेऊ अलंकार है पुत्र। तू इसे ग्रहण कर।‘
राजकर्मचारी चारूदत्त को ले जाने लगते हैं।‘
रोहसेन कर्मचारियों को रोकने की असफल कोशिश करता है। चारूदत्त कंधे पर सूली, गले में करवीर की माला और मन में संताप लिए वध-स्थल की ओर प्रस्थान करते हैं। रोहसेन कर्मचारियों को कहता है --
‘‘तुम मुझे मार डालो। मेरे पिता को छोड़ दो।‘
लेकिन कोई नहीं मानता। आर्य चारूदत्त को लेकर कर्मचारी जाते हैं। रोहसेन रोता रहता हैं। नगर में बार-बार घोषणा की जा रही है कि वसन्त सेना के हत्यारे चारूदत्त को सूली पर लटकाया जा रहा है। यह सूचना स्थावरक को मिलती है। वह महल से चिल्लाता है -‘ सुनो लोगों आर्य चारूदत्त निर्दोष है। मैं ही गाड़ी बदल जाने के कारण आर्या वसन्त सेना को पुष्पकरडंक वन में ले गया था। वहीं पर राजा के साले शकार ने वसन्त सेना को मार कर अपने अपमान का बदला लिया है।‘ मगर स्थावरक की आवाज महल में होने के कारण लोगों को सुनाई नहीं देती। स्थावरक महल से कूद कर आर्य चारूदत्त को बचाने का प्रयास करता है। वह कूद पड़ता है, उसकी बेड़ी भी टूट जाती है। वह तेजी से दौड़ कर रास्ता बनता हुआ सूली देने वाले कर्मचारियों तक पहुंचता है। वह घोषणा करता है --
‘राजा के साले शकार ने वसन्त सेना को गला घोंट कर मार डाला है क्योंकि वह राजा के साले को प्यार नहीं करती थी। उसने वसन्त सेना को मार कर अपने अपमान का बदला लिया है।‘
कर्मचारी -‘ क्या तुम सच बोल रहे हो ?‘
‘हां मैं सच बोल रहा हूं। यह बात किसी से कहूं नहीं इसलिए शकार ने मेरे को जकड़ कर महल की बुर्जी पर फेंक दिया था। मैं बुर्जी से कूद कर आया हूं ताकि निर्दोष चारूदत्त की जान बचा सकूं। ‘तभी श्ाकार भी वहां पर आ जाता है। स्थावरक उसे देखकर कहता है ‘ यही है वसन्त सेना का हत्यारा। राजा का साला शकार।
शकार स्थावरक को समझाना चाहता है, मगर स्थावरक नहीं मानता है। शकार कहता है -
‘मैं तो बहुत दयालु हूं। मैं किसी स्त्री को कैसे मार शकता हूं।‘
प्रजानन -‘वसन्त सेना को तुमने ही मारा है। चारूदत्त ने नहीं मारा है। तुम हत्यारे हो।‘
शकार -‘कौन कहता हैं ?‘
प्रजानन -‘स्थावरक कहता है।‘
शकार स्थावरक को पुनः अपनी ओर करने के प्रयास करता है। मगर स्थावरक जोर से कहता है।
‘दखो लोगों इसने मुझे यह कंगन देकर मुझसे चुप रहने के लिए कहा था। मगर मैं सच कहूंगा।‘
शकार कंगन ले लेता है और कहता है।
‘यही वह कंगन है जिशके कारण मैने इसे बांधा था। यह चोर है। मैंने इसे खूब मारा था। इसकी पीठ पर मार के निशान भी है। कंगन की चोरी के कारण ही यह बुर्जी पर बंदी था।‘ स्थावरक की बात पर अब कोई विश्वास नहीं करता। चारूदत्त पुनः निराश हो जाता है। शकार स्थावरक को मार पीट कर भगा देता है और राज कर्मचारियों को फांसी जल्दी लगने का हुक्म देता है तभी रोहसेन रोता हुआ आता है। शकार उसे भी चारूदत्त के साथ फांसी दे देने का आदेश देता है। चारूदत्त अपने पुत्र को समझा बुझा कर मां के पास जाने का आदेश देता है। कहता है --
‘बेटे अपनी मां को लेकर तपोवन चला जाना। रोहसेन तुम जाओं। मित्र मैत्रेय इस ले जाओ।‘ रोहसेन को लेकर मैत्रेय चला जाता है। शकार रोहसेन को भी मारने को कहता है मगर राज कर्मचारी ऐसा करने से मना कर देते हैं। राज कर्मचारी चारूदत्त के वध की अंतिम तैयारी करते हैं। शकार चारूदत्त को डण्डे से पीटने के लिए कहता है ताकि वह अपना अपराध स्वीकार करे। लोगों से कहें कि हां हत्या उसने ही की है। राज कर्मचारी चारूदत्त को मारते हैं। चारूदत्त मार के डर से स्वीकार करता है --
‘हे नगरवासियों वसन्त सेना की हत्या मैंने की है। मैंने ही वसन्त सेना को मारा है।‘
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दोनों राज कर्मचारी आपस में विचार कर रहे हैं, सूली पर चढ़ाने की बारी किसकी है, दोनों यह काम नहीं करना चाहते, क्योंकि चारूदत्त से उपस्कृत है। वे जल्दी भी नहीं करना चाहते। पहला दूसरे से पूछता है --
‘फांसी देने में जल्दी क्यों नहीं करनी चाहिए।‘
‘कभी-कभी कोई भला आदमी धन देकर मरने वाले को छुड़ा लेता है। कभी राजा की आज्ञा से अपराधी को छोड़ दिया जाता है और कभी राज्य में क्रान्ति हो जाने से सत्त बदल जाती है और सभी अपराधियों को आम माफी दे दी जाती है। क्या पता आज भी इनमें से कोई घटना घट जाये।‘ आर्य चारूदत्त का जीवन बच जाये।‘
मगर शकार इस काम में देरी नहीं करना चाहता। वह जल्दी से जल्दी फांसी दिलाना चाहता है।
प्रथम राज कमर्चारी -‘आर्य चारूदत्त ईश्वर का ध्यान करे। आपका अन्त समय निकट है।‘
चारूदत्त उच्च स्वर में कहता है -‘अगर मैं सच्चा हूं, तो वसन्त सेना कहीं से भी आकर मुझे इस कलंक से मुक्त करें।‘
कर्मचारी चारूदत्त को ले चलते हैं। शकार जल्दी करने को कहता है चारूदत्त को ले चलने में देरी होने पर कर्मचारी को डांटता डपटता है। आर्य चारूदत्त को वध स्थल तक पहुँचा दिया गया है।
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वसन्त सेना बौद्ध भिक्षु के साथ बिहार से नगर की ओर आ रही है। अचानक एक दिशा में भारी भीड़ को देखकर वह भिक्षु की जानकारी प्राप्त करने के लिए निवेदन करती है। भिक्षु बताते हैं --
-आर्य आपकी हत्या के आरोप में आर्य चारूदत्त को सूली पर चढ़ाने के लिए वध स्थल की ओर ले जाया जा रहा है।‘
‘आर्य चारूदत्त को सूली․․․․․․․․․․․․․․मुझे शीघ्र उस स्थान की ओर चलिये भिक्षु - प्रवर।‘
भिक्षु और वसन्त सेना तेजी से भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं। राज कर्मचारी चारूदत्त को सीधे लेट जाने का आदेश देते हैं। जल्लाद ज्योंहि तलवार से वार करना चाहता है कि तलवार उसके हाथ से गिर जाती है। कमर्चारी प्रसन्न होता है कि शायद चारूदत्त की जान बच जाये। मगर दूसरा कर्मचारी जल्दी से चारूदत्त का वध करने को कहता है। तभी भिक्षु और वसन्त सेना वध स्थल तक पहुँच जाते हैं। वे जोर से कहते हैं --
‘ठहरो ।․․․․․․․․․․․․․‘ठहरो ।․․․․․․․․․․․․․रुक जाओ। आर्य चारूदत्त को सूली पर मत चढ़ाओ।‘ वसन्त सेना प्रजा की आरे देख कर कहती है।
‘प्रजाजनों में ही वह वसन्त सेना हूं जिसकी हत्या के आरोप में आर्य चारूदत्त को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। मैं जीवित हूं। आर्य चारूदत्त निर्दोष हैं। वसन्त सेना और चारूदत्त आपस में लिपट जाते हैं। भिक्षु चारूदत्त के चरण छूकर कहता है।‘
‘मैं आपका पूर्व सेवक संवाहक हूं। आपने ही मुझे इस शहर में अपनी सेवामें रखा था। जुए की लत में सब कुछ हार जाने के बाद भिक्षु बन गया था।‘ वसन्त सेना के जीवित होने का समाचार बड़ी तेजी से प्रजा में फैल जाता है। महाराज तक भी पहुँचता है। शकार यह जानकर घबरा जाता है कि वसन्त सेना जीवित है। वह भागना चाहता है। मगर तभी राज कर्मचारी राजापालक की आज्ञा से शकार को पकड़ लेते हैं।
चारूदत्त वसन्त सेना को देखकर प्रसन्न हो जाते हैं। वे कहते हैं -- -वसन्त सेना। प्रिये तुम अचानक संजीवनी बूटी की तरह यहां तक कैसे पहुँच गई। मैं तो मर ही गया था । मगर अब मेरी जान बच गई।‘
वसन्त सेना सार्वजनिक रूप से घोषणा करती है कि राजा के साले शकार ने उसे मारने की कोशिश की थी। जन आक्रोश राजा के साले के विरूद्ध उमड़ पड़ता है। तभी शर्विलक आकर प्रजाननों के सामने घोषणा करता है कि दुष्ट राजा पालक का वध कर दिया गया है और गोप पुत्र आर्यक का राज्याभिषेक कर दिया गया है। राजा आर्यक अब स्वयं आर्य चारूदत्त के जीवन की रक्षा करेंगे।‘
शर्विलक चारूदत्त और वसन्त सेना को देखकर प्रणाम करता है। चारूदत्त उसे परिचय देने को कहते हैं। शर्विलक शर्म के साथ कहता है -
‘मैंने ही आपके धर में सेंध लगाकर आर्या वसन्त सेना के आभूषण चुराये थे। मैं आपका अपराधी हूं। आपकी शरण में हूं। मेरी रक्षा करें।‘
‘नहीं तुम तो मेरे मित्र हो। मैं प्रसन्न हूं।‘
‘एक ओर शुभ समाचार है कि राजा आर्यक ने गद्दी पर बैठते ही आपको वैणा नदी के किनारे वाला कुशावती राज्य दे दिया है। आप अब स्वयं राजा हैं।‘ शर्विलक कहता है।
तभी राज कर्मचारी शकार को पकड़ कर लाते हैं। शकार मारे डर के घबरा रहा है। कहता है --
‘मैं अनाथ अब किसकी शरण में जाऊं। मुझे शर्व दुःख हरने वाले चारूदत्त की शरण में जाना चाहिए।‘वह आर्य चारूदत्त के चरणों में गिरकर रक्षा की भिक्षा मांगता है। आर्य चारूदत्त उसे अभयदान देते हैं।
शर्विलक आर्य चारूदत्त से कहता है -‘आप जो भी दण्ड कहेंगे इस शकार को वहीं दण्ड दिया जायेगा।‘
‘चारूदत्त - ‘जो मैं चाहूंगा। वही होगा।‘
शर्विलक - ‘अवश्य भगवन।‘
शकार - ‘ मेरे प्रभो। मैं आपकी शरण में हूं। ऐशा बुरा काम फिर कभी नहीं करूंगा। मुझे बचालो भगवन ।‘
वसन्त सेना शकार को देखकर फांसी का फंदा चारूदत्त के गले से निकाल कर उस पर फेंक देती है।
शर्विलक फिर कहता है -‘आर्य चारूदत्त के आदेशों की पालना की जायेगी।
‘परम दयालु आर्य चारूदत्त शकार को क्षमा कर देते हैं। शकार शर्मिन्दा होकर चुपचाप चला जाता है।
आर्य चारूदत्त के जीवित होने तथा वसन्त सेना के सकुशल होने का समाचार मैत्रेय धूता तथा रोहसेन तक पहुँचाता है। सब परम् प्रसन्न होते हैं। धूता वसन्त सेना से गले मिलती है।
तभी आर्य चारूदत्त वसन्त सेना को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने की घोषणा करते हैं। वसन्त सेना चारूदत्त के चरण स्पर्श करती है। वसन्त सेना चारूदत्त की वधू बन गयी। वसन्त सेना का सिर आंचल से ढ़क दिया जाता है। शर्विलक को सभी बौद्ध विहारों का कुलपति बना दिया जाता है। राज कर्मचारियों को भी पारितोषिक दिया जाता है। आर्य चारूदत्त, धूता, रोहसेन, वसन्त सेना, मैत्रेय, रदनिका सभी प्रसन्न हैं। अपने आवास में लौट आते हैं।
सत्य की विजय हो।
शिव की जय हो।
सुन्दर का सम्मान हो।
सब सत्यम् शिवम् सुन्दरम् सुने, कहें, देखें और भोगे।
(समाप्त)
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यश्ावन्त कोठारी,
6, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,
जयपुर-302002 फोनः-2670596
e_mail: ykkothari3@yahoo.com
रचनाकार पर यशवन्त कोठारी के
जवाब देंहटाएंरूसी उपन्यास वसन्त सेना की
समापन किश्त अच्छी लगी।
भाई रवि रतलामी का इस उपन्यास को
पढ़वाने के लिए धन्यवाद।